बिहार का इस बार का चुनाव जितना ठस और मुद्दाविहीन रहा है, वैसा मेरी स्मृति में कभी नहीं रहा। सबसे खास बात यह है कि इस बार लोग कुछ बोलने को तैयार ही नहीं हैं, जबकि पहले चौक-चौराहों, पान की दुकानों, नाई के खोखों से लेकर सब्जी बाज़ार में कोई भी कहीं भी किसी भी प्लेटफॉर्म पर बिल्कुल सहज तौर पर अपनी पसंद-नापसंद बता देता था।
इसका कारण शायद यह है कि वह चतुर हो गया है, वह अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता या वह इतना अधिक डरा हुआ है और गोलबंदी इतनी अधिक है कि कोई भी किसी को ऑफेंड नहीं करना चाहता।
रही मुद्दों की बात, तो 2005 के चुनाव को छोड़कर बिहार में मुद्दों पर चुनाव कब हुआ है। सिर्फ इसी साल विकास के सवाल पर चुनाव हुआ और जनता ने झूमकर एनडीए को वोट भी दिया। 2010 का चुनाव तो केवल नीतीश के स्टेटस की वापसी थी। उससे पहले के चुनावों के बारे में सबको पता ही है। लालू यादव के लिए सिवाय प्रहसन के चुनाव और कुछ रहा भी नहीं है।
चुनाव इतने लंबे समय और अधिक चरणों में है कि दो चरण तो महज वार्म-अप में निबट गए। अब जाकर, थोड़ी गर्मी आयी है। हां, तथाकथित चुनाव विश्लेषक जो भी आंय-बांय बक दें, उनकी राय मूर्खताओं से इतर कुछ भी नहीं है।
वैसे, ये विश्लेषक एक बात जो बिल्कुल साफ है, उसे भी क्यों नहीं देख रहे, यह समझना मुश्किल है। लालू यादव जो ज़मीन के आदमी हैं, राजनीति के बहुत माहिर हैं, शातिर योद्धा हैं, पहली बार उनकी नर्वसनेस साफ दिख रही है। लालू यादव अपनी तमाम मूर्खतापूर्ण हरकतें जान-बूझकर करते थे, क्योंकि वह उनके 'कम्युनिकेशन' का स्टाइल था।
कैमरे के सामने सरसों का साग कच्चा ही चबा लेना, चैता सुनना, मुसहरटोली में बच्चों को नहला देना, उनके बाल काट देना, कलेजी बनाने लगना, लिट्टी सेंकना आदि-इत्यादि उनकी सोची-समझी रणनीति और कम्युनिकेशन-स्ट्रेटेजी थी। वह सचमुच बहुत ही सुघड़ और पढ़े-लिखे इंसान हैं, लेकिन वह उनका चुनावी चेहरा था। वह जानते थे कि बिहार की जनता को इसके जरिए वह आसानी से मूर्ख बनाते रहेंगे (गो कि जनता तो मूर्ख होती ही है) और उनका राज कायम रहेगा।
यह हुआ भी- 15 वर्षों तक होता रहा, लेकिन उस दवा की भी एक्सपायरी डेट आ गयी।
बिहार की स्थितियां, समीकरण और नारे बदल गए हैं। लालू यादव इस बात को महसूस कर चुके हैं। इसी वजह से हदस भी गए हैं। गोमांस पर आंय-बांय बोलना, शैतान का वास कराना, मीडिया को गाली देना, कार्यकर्ताओं पर बरसना, पीएम को ब्रह्मपिशाच कहना, उनका बधिया करने की बात बोलना, कबूतर, काला सरसों, तंत्र-मंत्र बकना....ये सब लालू के नर्वसनेस की निशानी है।
ज़मीन का यह खिलाड़ी शायद दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ चुका है। आप सब लोग अपनी मूर्खताओं के कंगूरों से कब उतरेंगे??
इसका कारण शायद यह है कि वह चतुर हो गया है, वह अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता या वह इतना अधिक डरा हुआ है और गोलबंदी इतनी अधिक है कि कोई भी किसी को ऑफेंड नहीं करना चाहता।
रही मुद्दों की बात, तो 2005 के चुनाव को छोड़कर बिहार में मुद्दों पर चुनाव कब हुआ है। सिर्फ इसी साल विकास के सवाल पर चुनाव हुआ और जनता ने झूमकर एनडीए को वोट भी दिया। 2010 का चुनाव तो केवल नीतीश के स्टेटस की वापसी थी। उससे पहले के चुनावों के बारे में सबको पता ही है। लालू यादव के लिए सिवाय प्रहसन के चुनाव और कुछ रहा भी नहीं है।
चुनाव इतने लंबे समय और अधिक चरणों में है कि दो चरण तो महज वार्म-अप में निबट गए। अब जाकर, थोड़ी गर्मी आयी है। हां, तथाकथित चुनाव विश्लेषक जो भी आंय-बांय बक दें, उनकी राय मूर्खताओं से इतर कुछ भी नहीं है।
वैसे, ये विश्लेषक एक बात जो बिल्कुल साफ है, उसे भी क्यों नहीं देख रहे, यह समझना मुश्किल है। लालू यादव जो ज़मीन के आदमी हैं, राजनीति के बहुत माहिर हैं, शातिर योद्धा हैं, पहली बार उनकी नर्वसनेस साफ दिख रही है। लालू यादव अपनी तमाम मूर्खतापूर्ण हरकतें जान-बूझकर करते थे, क्योंकि वह उनके 'कम्युनिकेशन' का स्टाइल था।
कैमरे के सामने सरसों का साग कच्चा ही चबा लेना, चैता सुनना, मुसहरटोली में बच्चों को नहला देना, उनके बाल काट देना, कलेजी बनाने लगना, लिट्टी सेंकना आदि-इत्यादि उनकी सोची-समझी रणनीति और कम्युनिकेशन-स्ट्रेटेजी थी। वह सचमुच बहुत ही सुघड़ और पढ़े-लिखे इंसान हैं, लेकिन वह उनका चुनावी चेहरा था। वह जानते थे कि बिहार की जनता को इसके जरिए वह आसानी से मूर्ख बनाते रहेंगे (गो कि जनता तो मूर्ख होती ही है) और उनका राज कायम रहेगा।
यह हुआ भी- 15 वर्षों तक होता रहा, लेकिन उस दवा की भी एक्सपायरी डेट आ गयी।
बिहार की स्थितियां, समीकरण और नारे बदल गए हैं। लालू यादव इस बात को महसूस कर चुके हैं। इसी वजह से हदस भी गए हैं। गोमांस पर आंय-बांय बोलना, शैतान का वास कराना, मीडिया को गाली देना, कार्यकर्ताओं पर बरसना, पीएम को ब्रह्मपिशाच कहना, उनका बधिया करने की बात बोलना, कबूतर, काला सरसों, तंत्र-मंत्र बकना....ये सब लालू के नर्वसनेस की निशानी है।
ज़मीन का यह खिलाड़ी शायद दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ चुका है। आप सब लोग अपनी मूर्खताओं के कंगूरों से कब उतरेंगे??
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