Sunday, 25 October 2015

दलित और सवर्ण: क्या मिथ्या, क्या सच्चाई

"बिना क्रिया के प्रतिक्रिया नही होती।"

दलितों को ये राजनैतिक दल और मीडिया वाले लोग जितना बेचारा दिखाते हैं उतने बेचारे तो दलित नही ही हैं। 90 का वो दशक याद कीजिये जब बिहार में पूर्ण रूपेण दलितों को सरकार का संरक्षण प्राप्त था और एक तरफ से दलितों ने सवर्णों को ठिकाने लगाना शुरू किया था। सवर्णों की स्थिति उस समय बेचारों जैसी हो गयी थी। दलितों के विरोध में ही "रणवीर सेना" का निर्माण हुआ और जब रणवीर सेना वालों ने गांव के गांव जलाना शुरू किया तब जा के ये दलितों द्वारा हो रहा जातिगत नरसंहार थम गया।

       कहने का सीधा सा मतलब यही है की किसी भी घटना को आप एक तरफ से जान कर निस्पक्ष नही हो सकते। उसके लिए आपको दोनों पक्षो को जानने की जरुरत है। फरीदाबाद वाली घटना में जो हुआ सो दुखद है। सबने शोक जताया लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नही की कि ऐसा क्यों हुआ? कोई तो वजह होगी? कोई युही सड़क पर चलते चलते किसी के घर में आग नही लगा देता।
              मामले के दोनों पक्षों को जानने समझने की जरुरत है।

बिहार-सवेरा" के लिए प्रणय राज की पेशकश...

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