हरसिद्धी से राकेश कुमार की रिपोर्ट:-
हरसिद्धि। मोतिहारी। सड़क से गुजर रहे ग्रामीण थोड़ी देर इन उजड़ी झोपड़ियों की ओर तिरछी नजरों से निहारते हैं। और संवेदनहीन बन बुदबुदाते हुए निकल पड़ते हैं। जी हां, खुले आसमां के सामने टकटकी लगाए इस बेघर परिवार की पीड़ा वहीं समझ सकता है। जिसने इस पल को जीया है। 25 सितम्बर की सुबह अपने साथ हुई ज्यादती से अभी भी यह परिवार उबरा नहीं है ।
- पकड़िया रोड स्थित विवेक भारती स्कूल के सामने रामप्रवेश साह का परिवार खुले आकाश के नीचे गुजर-बसर करने को मजबूर है। उसकी पत्नी धनवंती देवी बताती है कि चार बेटियों व दो बेटों समेत परिवार के कुल आठ सदस्यों की जिंदगी खानाबदोश की तरह कट रही है। रोजी-रोजगार भी बंद हो गयी है।किसी तरह मांगकर खाना-पीना हो रहा है। जिलाधिकारी के आदेश के बावजूद अभी तक जमीन का पर्चा नहीं मिल पाया है। दबंगों द्वारा उजाड़ी गई झोपड़ी को भी मरम्मत नहीं करने दिया जा रहा।
बड़ी बेटी बताती है कि ना तो रहने के लिए घर है। ना पहनने के लिए कपड़ा और ना खाने के लिए अन्न। पढ़ाई-लिखाई भी चौपट हो गई। खुले आकाश में रात की ठंड व ओस की बूंदे सता ही रही हैं। अंधेरी रात में लफंगों की अजीब-अजीब आवाज भी अनहोनी की आशंका बढ़ा देती है। वह ढबढबाते हुए सवाल करती है कि क्या इस समाज में गरीबों को जीने का कोई हक नहीं है?
हरसिद्धि। मोतिहारी। सड़क से गुजर रहे ग्रामीण थोड़ी देर इन उजड़ी झोपड़ियों की ओर तिरछी नजरों से निहारते हैं। और संवेदनहीन बन बुदबुदाते हुए निकल पड़ते हैं। जी हां, खुले आसमां के सामने टकटकी लगाए इस बेघर परिवार की पीड़ा वहीं समझ सकता है। जिसने इस पल को जीया है। 25 सितम्बर की सुबह अपने साथ हुई ज्यादती से अभी भी यह परिवार उबरा नहीं है ।
- पकड़िया रोड स्थित विवेक भारती स्कूल के सामने रामप्रवेश साह का परिवार खुले आकाश के नीचे गुजर-बसर करने को मजबूर है। उसकी पत्नी धनवंती देवी बताती है कि चार बेटियों व दो बेटों समेत परिवार के कुल आठ सदस्यों की जिंदगी खानाबदोश की तरह कट रही है। रोजी-रोजगार भी बंद हो गयी है।किसी तरह मांगकर खाना-पीना हो रहा है। जिलाधिकारी के आदेश के बावजूद अभी तक जमीन का पर्चा नहीं मिल पाया है। दबंगों द्वारा उजाड़ी गई झोपड़ी को भी मरम्मत नहीं करने दिया जा रहा।
बड़ी बेटी बताती है कि ना तो रहने के लिए घर है। ना पहनने के लिए कपड़ा और ना खाने के लिए अन्न। पढ़ाई-लिखाई भी चौपट हो गई। खुले आकाश में रात की ठंड व ओस की बूंदे सता ही रही हैं। अंधेरी रात में लफंगों की अजीब-अजीब आवाज भी अनहोनी की आशंका बढ़ा देती है। वह ढबढबाते हुए सवाल करती है कि क्या इस समाज में गरीबों को जीने का कोई हक नहीं है?

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