गोविन्दगंज जो परिसीमन से पहले 20-गोविन्दगंज कहलाता था। यह 20 नम्बर भोजपुरी के बीस पड़ने यानि वर्चस्ववादी होने का एक अच्छा संयोग था। यहाँ से जितने वाले लोग हमेशा प्रभावी भूमिका में रहे। चाहे ध्रुवनारायण मणि तिवारी रहे हों या जनता दल सरकार में सिंचाई मंत्री रहे योगेन्द्र पाण्डेय या फिर देवेन्द्र नाथ दूबे या राजन तिवारी हर किसी की खास चर्चा हुई सूबे की सियासत में।
गोविन्दगंज का मूड बदला 2005 में जब जदयू की श्रीमती मीना द्विवेदी ने लोजपा के बाहुबली राजन तिवारी को फरवरी और नवम्बर के विस चुनावों में करारी शिकस्त दी। गोविन्दगंज की वर्चस्ववादी छवि टूटी पर साथ हीं अच्छी बात ये हुई कि जहाँ की नियति संगीनों के साये में कैद थी वो कहीं न कहीं आजाद हुई। श्रीमती द्विवेदी जो कि स्वं बाहुबली परिवार की महिला थीं और अपने देवर देवेन्द्र नाथ और पति भूपेन्द्र नाथ दूबे की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने वाली थीं, ने क्षेत्र में कभी दबंगई को प्रश्रय नहीं दिया। अपने पति की तरह विद्वान और देवर की तरह लोकप्रिय बेशक न रहीं हों पर एक तबके में जो 'जियो और जीने दो' 'कमाओ खाओ और कमाने खाने दो' में विश्वास रखता है, में खासी जानी गयीं। पार्टी की एक अनुशासित नेता रहीं और कभी पारिवारिक विरासत के आधार पर कोई सरकारी पद नहीं माँगा।
आप सोच रहे होंगे कि इस आलेख का इतना हिस्सा मीना द्विवेदी पर हीं क्यों ? तो बता दूं कि गोविन्दगंज की चुनावी फिज़ा फिलहाल उन्हीं के कारण बदल गयी है। लगातार तीन बार जीत दर्ज करने के बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उनका टिकट काट दिया। सो उन्होंने पार्टी के साथ-साथ अपनी उम्मीदवारी भी छोड़ दी। उनके मैदान खाली कर देने के बाद से उनके मतदाता आधार का स्पष्ट बंटवारा होता नहीं दिख रहा। एक ओर हैं राजू तिवारी जो एनडीए की ओर से लोजपा उम्मीदवार हैं.
दूसरी ओर हैं एनडीटीवी के पत्रकार रविश कुमार के भाई ब्रजेश कुमार पाण्डेय जो महागठबंधन में कांग्रेस प्रत्याशी हैं।
सपा के कृष्णकांत मिश्र और बहुजन समाज पार्टी की ओर से अरेराज नगर पंचायत की मुख्य पार्षद पूर्णिमा देवी के पति मंटू दूबे मैदान में हैं। समीकरण की नजरों से देखें तो कुल मिलाकर ब्राह्मण वार की स्थिति है। सभी ब्राह्मण बहुल गोविन्दगंज की अधिसंख्य ब्राह्मण मतदाताओं पर दावा ठोंक रहे हैं। पर सबकी अपनी-अपनी कमजोरियां हैं। राजू तिवारी का आपराधिक ग्राफ उनकी जीत पर संशय लगा रहा है तो कांग्रेसी उम्मीदवार अपने क्षेत्र के लिए हीं अनजान मालूम पड़ते हैं। कृष्णा मिश्र की ब्राह्मणों में पैठ दिखती है पर एक ओर बाहुबल तो दूसरी ओर धनबल के आगे वो काफ़ी निरीह दिख रहे हैं। मंटू दूबे अपने मामा जयप्रकाश पाण्डेय का नाम भुना सकते हैं पर विधायक के हिसाब से उनका कद काफी छोटा दिखता है।
गोविन्दगंज में नारायणी की बाढ़ और कटाव हाल तक एक बड़ा मुद्दा था जिसपर बिधायक रहते राजन तिवारी ने ज्यादा रूचि नहीं ली। स्वर्गीय भूपेन्द्र नाथ दूबे द्वारा 2003 में बांध बचाने की कोशिशों ने उनके कुनबे को जबर्दस्त सियासी ताकत दी जिससे उनकी विधवा श्रीमती मीना द्विवेदी लगातार तीन चुनाव जीतीं। अब जबकि नारायणी की धारा दक्षिण में मूड़ चुकी है और गोविन्दगंज का खतरा टल चूका है.
यहां का चुनावी मुद्दा भी वहीं है - 'बिजली-सड़क-रोजगार'
ब्राह्मण बहुल होने के कारण मूड तो एनडीए के पक्ष में है पर मतदाता सशंकित हैं। क्या राजू तिवारी खुद को बदलेंगे या एकबार फिर से गोविन्दगंज दबंगई के राज़ में चला जायेगा ! मीना द्विवेदी के मैदान छोड़ने से जहाँ पारिवारिक जुड़ाव रखने वाले मतदाता राजू तिवारी की ओर देख रहे हैं (राजू तिवारी भी देवेन्द्र नाथ दूबे के करीबी, उनके शिष्य रहे) हैं तो जदयू के कैडर वोट कांग्रेस को ट्रांसफर होगा,तय नहीं मान सकते।
गोविन्दगंज जो कि हमेशा अपने विशेष निर्णयों से चौकाता रहा है इस बार भी यहाँ लीक से हटकर कुछ होगा इसकी आशा बनी हुई है....
प्रस्तुति:- "अंकित दुबे"
गोविन्दगंज का मूड बदला 2005 में जब जदयू की श्रीमती मीना द्विवेदी ने लोजपा के बाहुबली राजन तिवारी को फरवरी और नवम्बर के विस चुनावों में करारी शिकस्त दी। गोविन्दगंज की वर्चस्ववादी छवि टूटी पर साथ हीं अच्छी बात ये हुई कि जहाँ की नियति संगीनों के साये में कैद थी वो कहीं न कहीं आजाद हुई। श्रीमती द्विवेदी जो कि स्वं बाहुबली परिवार की महिला थीं और अपने देवर देवेन्द्र नाथ और पति भूपेन्द्र नाथ दूबे की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने वाली थीं, ने क्षेत्र में कभी दबंगई को प्रश्रय नहीं दिया। अपने पति की तरह विद्वान और देवर की तरह लोकप्रिय बेशक न रहीं हों पर एक तबके में जो 'जियो और जीने दो' 'कमाओ खाओ और कमाने खाने दो' में विश्वास रखता है, में खासी जानी गयीं। पार्टी की एक अनुशासित नेता रहीं और कभी पारिवारिक विरासत के आधार पर कोई सरकारी पद नहीं माँगा।
आप सोच रहे होंगे कि इस आलेख का इतना हिस्सा मीना द्विवेदी पर हीं क्यों ? तो बता दूं कि गोविन्दगंज की चुनावी फिज़ा फिलहाल उन्हीं के कारण बदल गयी है। लगातार तीन बार जीत दर्ज करने के बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उनका टिकट काट दिया। सो उन्होंने पार्टी के साथ-साथ अपनी उम्मीदवारी भी छोड़ दी। उनके मैदान खाली कर देने के बाद से उनके मतदाता आधार का स्पष्ट बंटवारा होता नहीं दिख रहा। एक ओर हैं राजू तिवारी जो एनडीए की ओर से लोजपा उम्मीदवार हैं.
दूसरी ओर हैं एनडीटीवी के पत्रकार रविश कुमार के भाई ब्रजेश कुमार पाण्डेय जो महागठबंधन में कांग्रेस प्रत्याशी हैं।
सपा के कृष्णकांत मिश्र और बहुजन समाज पार्टी की ओर से अरेराज नगर पंचायत की मुख्य पार्षद पूर्णिमा देवी के पति मंटू दूबे मैदान में हैं। समीकरण की नजरों से देखें तो कुल मिलाकर ब्राह्मण वार की स्थिति है। सभी ब्राह्मण बहुल गोविन्दगंज की अधिसंख्य ब्राह्मण मतदाताओं पर दावा ठोंक रहे हैं। पर सबकी अपनी-अपनी कमजोरियां हैं। राजू तिवारी का आपराधिक ग्राफ उनकी जीत पर संशय लगा रहा है तो कांग्रेसी उम्मीदवार अपने क्षेत्र के लिए हीं अनजान मालूम पड़ते हैं। कृष्णा मिश्र की ब्राह्मणों में पैठ दिखती है पर एक ओर बाहुबल तो दूसरी ओर धनबल के आगे वो काफ़ी निरीह दिख रहे हैं। मंटू दूबे अपने मामा जयप्रकाश पाण्डेय का नाम भुना सकते हैं पर विधायक के हिसाब से उनका कद काफी छोटा दिखता है।
गोविन्दगंज में नारायणी की बाढ़ और कटाव हाल तक एक बड़ा मुद्दा था जिसपर बिधायक रहते राजन तिवारी ने ज्यादा रूचि नहीं ली। स्वर्गीय भूपेन्द्र नाथ दूबे द्वारा 2003 में बांध बचाने की कोशिशों ने उनके कुनबे को जबर्दस्त सियासी ताकत दी जिससे उनकी विधवा श्रीमती मीना द्विवेदी लगातार तीन चुनाव जीतीं। अब जबकि नारायणी की धारा दक्षिण में मूड़ चुकी है और गोविन्दगंज का खतरा टल चूका है.
यहां का चुनावी मुद्दा भी वहीं है - 'बिजली-सड़क-रोजगार'
ब्राह्मण बहुल होने के कारण मूड तो एनडीए के पक्ष में है पर मतदाता सशंकित हैं। क्या राजू तिवारी खुद को बदलेंगे या एकबार फिर से गोविन्दगंज दबंगई के राज़ में चला जायेगा ! मीना द्विवेदी के मैदान छोड़ने से जहाँ पारिवारिक जुड़ाव रखने वाले मतदाता राजू तिवारी की ओर देख रहे हैं (राजू तिवारी भी देवेन्द्र नाथ दूबे के करीबी, उनके शिष्य रहे) हैं तो जदयू के कैडर वोट कांग्रेस को ट्रांसफर होगा,तय नहीं मान सकते।
गोविन्दगंज जो कि हमेशा अपने विशेष निर्णयों से चौकाता रहा है इस बार भी यहाँ लीक से हटकर कुछ होगा इसकी आशा बनी हुई है....
प्रस्तुति:- "अंकित दुबे"




Mantu dubey jai Prakash Pandey ke bhanje nhi hain*ye dusre mantu dubey hain*rajepur ke#
ReplyDeleteअपनी जानकारी दुरुस्त करें।
ReplyDelete