Tuesday, 13 October 2015

क्या रूख देख के भाजपा ने दुशमन बदल लिया..?

जैसे चुनावी चरण शुरू हुए हैं एक बात तो स्पष्ट दिख रही है कि अब बीजेपी निशाने पर महागठबंधन के बजाय लालू को ले रही है। यह काफी हद तक ध्यान देने वाली और समझने वाली बात है की अचानक से भाजपा ने अपना निशाना बदलकर लालू की तरफ क्यों कर दिया ? ऐसी क्या वजह हो सकती है की भाजपा नितीश से भिड़ना नही चाह रही है या उन्हें नजरअंदाज कर रही है??
     मेरी समझ से इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला तो ये की नितीश की छवि बिहार में विकास पुरुष के तौर पर है। पिछले 10 साल के शासन में 7 साल तक भाजपा भी नितीश की साथी रह चुकी है और ऐसे में पूरी तरह से नितीश को फेल बताने में खुद की भी किड़किरि होगी। नितीश के "विकास पुरुष" वाली छवि की तुलना में लालू एक सजायाफ्ता मुजरिम हैं और जमानत पे बाहर हैं, उन्हें "जंगलराज का जनक" भी कहा जाता रहा है तथा कही न कहीं आज भी लोगों के मन में उस जंगलराज का डर है। इसलिए उस जंगलराज का डर दिखा कर वोट लेना ज्यादा आसान है।
         एक और मुख्य कारण यह हो सकता है की अगर चुनाव बाद स्थिति ऐसी बनती है की महागठबंधन में नीतिश CM बनने की स्थिति में ना हों (अगर राजद जदयू से ज्यादा सीट जीत जाये तो इसके पुरे आसार हैं) तो वो राजग के साथ हो लें। इसकी उम्मीद कम है लेकिन प्यार और युद्ध में सब जायज है। ऐसे में लालू अकेले पड़ जायेंगे।
      खैर अनुमान बहुत हैं अंजाम तो 8 नवंबर को ही पता चलेगा तबतक लोकतंत्र के इस पर्व का आनंद लीजिये और हाँ वोट जरूर दीजियेगा।

"बिहार-सवेरा" के लिए ''प्रणय राज'' की स्पेशल रिपोर्ट:-

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